Sunday, June 27, 2010

शम्बूक हत्या वाला रामराज्य लौटने की कवायद क्यों ?


Ramayana Stories 17
From Spiritual India
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रामायण - उत्तरकाण्ड - ब्राह्मण बालक की मृत्यु
http://www.spiritualindia.org/wiki/Ramayana_Stories_17 से साभार
एक दिन श्रीराम अपने दरबार में बैठे थे तभी एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुये पुत्र का शव लेकर राजद्वार पर आया और 'हा पुत्र!' 'हा पुत्र!' कहकर विलाप करते हुये कहने लगा, "मैंने पूर्वजन्म में कौन से पाप किये थे जिससे मुझे अपनी आँखों से अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु देखनी पड़ी। केवल तेरह वर्ष दस महीने और बीस दिन की आयु में ही तू मुझे छोड़कर सिधार गया। मैंने इस जन्में कोई पाप या मिथ्या-भाषण भी नहीं किया। फिर तेरी अकाल मृत्यु क्यों हुई? इस राज्य में ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं हुई। निःसन्देह यह श्रीराम के ही किसी दुष्कर्म का फल है। उनके राज्य में ऐसी दुर्घटना घटी है। यदि श्रीराम ने तुझे जीवित नहीं किया तो हम स्त्री-पुरुष यहीं राजद्वार पर भूखे-प्यासे रहकर अपने प्राण त्याग देंगे। श्रीराम! फिर तुम इस ब्रह्महत्या का पाप लेकर सुखी रहना। राजा के दोष से जब प्रजा का विधिवत पालन नहीं होता तभी प्रजा को ऐसी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इससे स्पष्ट है कि राजा से ही कहीं कोई अपराध हुआ है।" इस प्रकार की बातें करता हुआ वह विलाप करने लगा।
जब श्रीरामचन्द्रजी इस विषय पर मनन कर रहे थे तभी वशिष्ठजी आठ ऋषि-मुनियों के साथ दरबार में पधारे। उनमें नारद जी भी थे। श्री राम ने जब यह समस्या उनके सम्मुख रखी तो नारद जी बोले, "राजन्! जिस कारण से इस बालक की अकाल मृत्यु हुई वह मैं आपको बताता हूँ। सतयुग में केवल ब्राह्मण ही तपस्या किया करते थे। फिर त्रेता के प्रारम्भ में क्षत्रियों को भी तपस्या का अधिकार मिल गया। अन्य वर्णों का तपस्या में रत होना अधर्म है। हे राजन्! निश्‍चय ही आपके राज्य में कोई शूद्र वर्ण का मनुष्य तपस्या कर रहा है, उसी से इस बालक की मृत्यु हुई है। इसलिये आप खोज कराइये कि आपके राज्य में कोई व्यक्‍ति कर्तव्यों की सीमा का उल्लंघन तो नहीं कर रहा। इस बीच ब्राह्मण के इस बालक को सुरक्षित रखने की व्यवस्था कराइये।"
नारदजी की बात सुनकर उन्होंने ऐसा ही किया। एक ओर सेवकों को इस बात का पता लगाने के लिये भेजा कि कोई अवांछित व्यक्‍ति ऐसा कार्य तो नहीं कर रहा जो उसे नहीं करना चाहिये। दूसरी ओर विप्र पुत्र के शरीर की सुरक्षा का प्रबन्ध कराया। वे स्वयं भी पुष्पक विमान में बैठकर ऐसे व्यक्‍ति की खोज में निकल पड़े। पुष्पक उन्हें दक्षिण दिशा में स्थित शैवाल पर्वत पर बने एक सरोवर पर ले गया जहाँ एक तपस्वी नीचे की ओर मुख करके उल्टा लटका हुआ भयंकर तपस्या कर रहा था। उसकी यह विकट तपस्या देख कर उन्होंने पूछा, "हे तपस्वी! तुम कौन हो? किस वर्ण के हो और यह भयंकर तपस्या क्यों कर रहे हो?"
यह सुनकर वह तपस्वी बोले, "महात्मन्! मैं शूद्र योनि से उत्पन्न हूँ और सशरीर स्वर्ग जाने के लिये यह उग्र तपस्या कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बूक है।"

शम्बूक की बात सुनकर रामचन्द्र ने म्यान से तलवार निकालकर उसका सिर काट डाला। जब इन्द्र आदि देवताओं ने महाँ आकर उनकी प्रशंसा की तो श्रीराम बोले, "यदि आप मेरे कार्य को उचित समझते हैं तो उस ब्राह्मण के मृतक पुत्र को जीवित कर दीजिये।" राम के अनुरोध को स्वीकार कर इन्द्र ने विप्र पुत्र को तत्काल जीवित कर दिया।


16 comments:

  1. जय भीम जी......



    आपने एक हृदय विदारक घटना का उल्लेख किया है,जिसे मै पहले बहुत से श्रीमुखो से सुन चुका हूँ,पर उन्होंने कहा से सुनी वो इसका जवाब "तेरे-मेरे से ही" देते है!आपने इसे कहा पढ़ा अथवा कहा से उद्धृत लिया उस ग्रन्थ का भी उल्लेख कर देते तो बड़ी कृपा होती विप्र्श्रेष्ठ.....



    कुंवर जी,

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    1. अनसुना सत्य जानने हेतु नीचे शब्दों पर क्लिक करें और पढ़ें...!!

      राम ने न तो सीता जी को वनवास दिया और न शम्बूक का वध किया

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  2. शम्बूक हत्या और सीतात्याग के वास्तविक तत्वार्थ भव भूति के उत्तर रामचरित में पढिये----सब कष्ट दूर होजायेंगे....

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  3. यह कथा पूरी तरह बकवास और कल्पोकल्पित है.यह सिर्फ तथाकथित उच्च लोगो द्वारा गरीब पिछड़े लोगो को शिक्षा से वान्चिंत रखने के लिए फैलाया हुआ एक धुआ है.जो अपनी एक ही फूक से हट जाता है.

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  4. aise moorkhatapoorn lekho se kewal hinduo ko bantne ka prayas un shaktiyon dwara kiya ja raha hai jo kisi bhi haal me hinduo ko kamjor kar is desh ki jado ko khokhala karna chahte hain.

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  5. @ Dr. shyam gupta ..." शम्बूक हत्या और सीतात्याग के वास्तविक तत्वार्थ भव भूति के उत्तर रामचरित में पढिये----सब कष्ट दूर होजायेंगे...." isske liye shudr hi ki hatya karni thi ... koi .. vaisiye ..ya brahaman nahi mila .. sab nautanki hai

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  6. kya kisi shudra ke tapasya se koi mar sakta hai ye baat aap sab soco aur kisi ko marne se koi jinda kaise ho sakta hai ye murkh logo ne bhagwan ram ko badnam karne ka jo kam kiya hai is se yahi maloom hota hai ye agyani jindgi bhar rahenge koi mai ka lal agar thodi bhi bhudhi rakhta ho to meri bat ko soche
    1) agar aryo ne is bharat par hamla kiya to unki orignal desh ka naam bataya jaye aur to aur arya ya brahmin sirf india main hai aur kahi nahi is se pata chalta hai ki sab ek hai
    2) agar arya ne bharat main humla kiya to unhone aur kaha kaha humla kiya aur kon se desh jite kyo ki history is baat ki gavah hai ki muslim , british aur sikandar jaise logo ne puri duniya main humla kiya to aryo ne sirf bharat par humla karke kyo ruk gaye
    3) aryo se pehle yaha ke logo ka religion kya tha aur sanskriti

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  7. teesri azadi film dekho aur poora rahasya jano
    yeh film internet par maujood hai

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  8. यह असत्य है ओर तथाकथित अतिवादी ओर स्वार्थी ब्राहम्णो का फैलाया हुआ झुठ है जिसकी वजह से 3000 साल से भी अधिक समय तक इन लोगो ने शुद्र समाज का शोषण किया ओर नारकीय जीवन जिने पर मजबूर किया। धन्य है भारत का संविधान ओर बाबा साहब जिन्होने इस अमानविय परंपरा को खत्म करने के सार्थक प्रयास किए।

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  9. यह असत्य है ओर तथाकथित अतिवादी ओर स्वार्थी ब्राहम्णो का फैलाया हुआ झुठ है जिसकी वजह से 3000 साल से भी अधिक समय तक इन लोगो ने शुद्र समाज का शोषण किया ओर नारकीय जीवन जिने पर मजबूर किया। धन्य है भारत का संविधान ओर बाबा साहब जिन्होने इस अमानविय परंपरा को खत्म करने के सार्थक प्रयास किए।

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  10. यह असत्य है ओर तथाकथित अतिवादी ओर स्वार्थी ब्राहम्णो का फैलाया हुआ झुठ है जिसकी वजह से 3000 साल से भी अधिक समय तक इन लोगो ने शुद्र समाज का शोषण किया ओर नारकीय जीवन जिने पर मजबूर किया। धन्य है भारत का संविधान ओर बाबा साहब जिन्होने इस अमानविय परंपरा को खत्म करने के सार्थक प्रयास किए।

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  11. जो रामकथा नारद जी वाल्मीकि को सुनाते हैं, न केवल उसमें यह वर्णन नहीं है, वरन उसमें यह स्पष्ट लिखा है कि शूद्र भी रामायण पढ़कर या सुनकर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। शम्बूक वध की घटना तो निश्चित ही वाल्मीकि के काल की नहीं हो सकती क्योंकि तब तक अनेक उपनिषद लिखे जा चुके थे । उपनिषदों में तो न केवल शूद्रों ने तपस्या की है वरन उनमें से कुछ तो मंत्र दृष्टा बनकर औपनिषदिक ऋषि की गरिमा को प्राप्त हुए हैं, यथा ऐतरेय, सत्यकाम आदि। ‘जन्मना जायते शूद्र:। संस्कारात द्विज उच्यते।’ जन्म से हम सभी शूद्र हैं, संस्कार पाकर ही हमारा दूसरा जन्म होता है। मानव व्यवहार का इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है, बालक को अच्छे संस्कार दो वरना वह ‘शूद्र’, आज के अनुभवों से तो कहना चाहिये कि राक्षस, ही बनेगा। स्वयं क्षत्रिय विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि बनना इसका उदाहरण है; उनके ब्रह्मर्षि बनने में उनके क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या ही अवरोध थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से चौथे अध्याय में स्पष्ट कहा है :
    “चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुण कर्म विभागश:” अर्थात “मैने मनुष्यों के गुणों और कर्मॊं के अनुसार चार वर्ण रचे हैं।”
    महाभारत में कि ब्राह्मण कौन है, युधिष्ठिर बार बार यही उत्तर देते हैं कि गुणवान ही ब्राह्मण है चाहे जन्म से वह कोई भी हो ।
    उपनिषदों की सारी शिक्षा मानव मात्र के लिये है, किसी धर्म, या जाति या रंग के लिये नहीं, उसके ऋषि तो सब प्राणियों में एकत्व ही देखते हैं। नारद जी ने वाल्मीकि को जो राम कथा सुनाई उसमें वे कहते हैं कि राम ने सभी वेदों का समुचित अध्ययन किया है। समस्त रामायण में श्रीराम के समस्त कार्यों में यही मानव की एकता और प्रेम देखा जा सकता है, वे तो मनुष्य के गुणकर्म देखकर ही यथायोग्य व्यवहार करते हैं। अत: श्री राम को तो एक शूद्र द्वारा तपस्या करने पर अत्यंत प्रसन्न होना था, न कि उसकी ह्त्या करना था। वैसे भी यह तो वही श्री राम हैं जो कि एक भीलनी शबरी से मात्र मिलने के लिये अपने रास्ते से हटकर जाते हैं, उस शबरी के पास कि जिससे मिलने के लिये सूचना एक राक्षस कबन्ध देता है। वही श्री राम जो निषादराज केवट को गले लगाते हैं, उसे प्रिय मित्र कहते हैं। वे चाहते तो नदी पार करने के बाद केवट को पारिश्रमिक (अँगूठी नहीं, जो कि उऩ्होंने दिलवाई) तथा धन्यवाद देकर बिना गले लगाये महान ऋषियों से भेंट करने आगे जा सकते थे, जैसा कि सामान्यतया होता है । किन्तु श्री राम ने केवट को मित्र मानते हुए गले लगाया। वे कैसे एक शूद्र की तपस्या करने के कारण उसकी हत्या कर सकते हैं !

    ऐसा सुनने में आया कि शम्बूक वध घटना का उदाहरण देकर डाक्टर अम्बेडकर ने घोषणा की थी कि वे ऐसे हिदू धर्म का सम्मान नहीं कर सकते, जिसमें राजा राम एक शूद्र का तपस्या करने के कारण वध कर देता है। काश किसी विद्वान ने उऩ्हें सत्य का परिचय कराया होता, तो आज जो गलत तथा दुखद भेद दलितों तथा अन्य में हो गया है वह न होता। रामायण में उस प्रक्षेप डालने वाले शत्रु ने हिंदू धर्म पर कितना बड़ा सफ़ल प्रहार किया है; उसके कौशल की प्रशंसा करते ही बनती है,और हमारे सही न सोचने की जितनी निंदा की जाए,उतनी कम है।

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  12. अनसुना सत्य जानने हेतु नीचे शब्दों पर क्लिक करें और पढ़ें...!!

    राम ने न तो सीता जी को वनवास दिया और न शम्बूक का वध किया

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  13. वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड का समापन पढ़ने से यह तो एकदम स्पष्ट हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण वहीं पर समाप्त हो जाती है। युद्ध काण्ड के समापन पर रामायण पाठ की फ़लश्रुति आ जाती है – ‘जो भी इस रामायण का पाठ या श्रवण करेगा उसे बहुत पुण्य मिलेगा’ इत्यादि। जब नारद जी वाल्मीकि को राम कथा सुनाते हैं तब वहां भी फ़लश्रुति है, किसी‌ अन्य काण्ड के अंत में फ़लश्रुति नहीं है। पारंपरिक फ़लश्रुति ग्रन्थों के अंत में‌ आती हैं। अर्थात वाल्मीकि रामायण का समापन युद्धकाण्ड के बाद हो गया। तब इसके बाद उत्तरकाण्ड के लिखे जाने की‌ बात ही नहीं‌ बनती। वाल्मीकि को श्री राम की कथा ज्ञात नहीं थी। वह तो वाल्मीकि के ही अनुरोध पर ब्रह्मा जी ने नारद जी को उनके पास श्री राम की कथा सुनाने के लिये भेजा था। नारद मुनि जो कथा वाल्मीकि को सुनाते हैं वह महर्षि वाल्मीकि जी ने बाल काण्ड में ही लिख दी है। उस कथा में ‘उत्तर काण्ड नहीं‌ है। तब वाल्मीकि कैसे अपनी रामायण में उत्तर काण्ड लिख सकते हैं‌ ! अर्थात यह उत्तर काण्ड प्रक्षेप है। महर्षि व्यास के महाभारत में भी रामायण है, और उसमें भी उत्तर काण्ड नहीं‌ है। अर्थात यह प्रक्षेप महाभारत की रचना के बाद डाला गया। कब डाला गया ? शम्बूक वध की घटना तो निश्चित ही वाल्मीकि के काल की नहीं हो सकती क्योंकि तब तक अनेक उपनिषद लिखे जा चुके थे । उपनिषदों में तो न केवल शूद्रों ने तपस्या की है वरन उनमें से कुछ तो मंत्र दृष्टा बनकर औपनिषदिक ऋषि की‌ गरिमा को प्राप्त हुए हैं, यथा ऐतरेय, सत्यकाम आदि। ऐतरेय एक रखैल के पुत्र थे, उऩ्हें गुरुकुल में शिक्षा द्वारा संस्कार मिले, और उनके द्वारा रचित पूरा ‘ऐतरेय उपनिषद’ ही है जो ऋग्वेद का उपनिषद है। सत्यकाम न केवल शूद्र थे वरन एक अवैध बालक भी थे। इऩ्हें भी गुरुकुल में शिक्षा द्वारा संस्कार मिले और वे ऋषि बने। यह मान्यता भी थी कि ‘जन्मना जायते शूद्र:। संस्कारात द्विज उच्यते।’ जन्म से हम सभी शूद्र हैं, संस्कार पाकर ही‌ हमारा दूसरा जन्म होता है। मानव व्यवहार का इस कथन में एक मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है, बालक को अच्छे संस्कार दो वरना वह ‘शूद्र’, आज के अनुभवों से तो कहना चाहिये कि राक्षस, ही बनेगा। वैसे भी त्रेता और द्वापर युगों में तो जातियां कर्म के आधार पर ही‌ मान्य थीं। स्वयं क्षत्रिय विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि बनना इसका उदाहरण है; उनके ब्रह्मर्षि बनने में उनके क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या ही अवरोध थे। श्री राम हैं जो कि एक भीलनी शबरी से मात्र मिलने के लिये अपने रास्ते से हटकर जाते हैं, उस शबरी के पास कि जिससे मिलने के लिये सूचना एक राक्षस कबन्ध देता है। वही श्री राम जो निषादराज केवट को गले लगाते हैं, उसे प्रिय मित्र कहते हैं। वे चाहते तो नदी पार करने के बाद केवट को पारिश्रमिक (अँगूठी नहीं, जो कि उऩ्होंने दिलवाई) तथा धन्यवाद देकर बिना गले लगाये महान ऋषियों से भेंट करने आगे जा सकते थे, जैसा कि सामान्यतया होता है । किन्तु श्री राम ने केवट को मित्र मानते हुए गले लगाया। वे कैसे एक शूद्र की तपस्या करने के कारण उसकी हत्या कर सकते हैं !उत्तर काण्ड के अन्त में लिखा है,’उत्तर काण्ड सहित यहां तक यह आख्यान ब्रह्म पूजित है।’ इस कथन में ‘उत्तर काण्ड सहित’ लिखने के कारण संदेह होता है कि उत्तर काण्ड पर अनावश्यक बल दिया जा रहा है अत: ‘दाल में काला ‘ है। महाभारत काल के काफ़ी‌ बाद तक ‘श्री राम’ का विरोध करने वाला कोई नहीं‌ हुआ था। अम्बेडकर ने घोषणा की थी कि वे ऐसे हिदू धर्म का सम्मान नहीं कर सकते, जिसमें राजा राम एक शूद्र का तपस्या करने के कारण वध कर देता है। काश किसी‌ विद्वान ने उऩ्हें सत्य का परिचय कराया होता, तो आज जो गलत तथा दुखद भेद दलितों तथा अन्य में‌ हो गया है वह न होता।

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  14. राम ने ब्राह्मण रावण का वध किया,यहां ब्राह्मण जाति नहीं थी,ना कर्म।बल्कि ब्राह्मण रावण के कुकर्म से उसका वध हुआ।शम्बूक में जाति मत देखिए,राम ने बाली का भी वध किया,जो वानर था,क्योंकि वंचित सुग्रीव की सहायता करनी थी।राम बाली का साथ लेते तो वो एक दिन में रावण को ले आता।राम वंचितों और न्याय के साथ हैं।

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