सत्य गौतम अभावों की कोख से जन्मा हुआ और जीवन के घावों को ढोने वाला एक ऐसा बदनसीब इंसान है जिसे किसी से प्यार के बोल सुनने नसीब न हुए, न आज न पहले। सत्य गौतम केवल सत्य गौतम है, अगर कैरानवी होता तो अच्छा होता। उसे अपने अभावों और घावों की पूर्ति के लिए किसी ‘रब‘ का आसरा तो है। यहां तो ‘अप्प दीपो भवः‘ होना पड़ता है। वह परलोक आत्मा और तकदीर को मानता है यहां इसका कोई अनुभव नहीं है। जिसका अनुभव ही नहीं है उसे मानना मेरा काम नहीं है और उसके इंकार में समय लगाना भी मैं अपनी ऊर्जा गंवाना ही मानता हूं।मैं सत्य को कम जानता हूं और असत्य को पूरा। सम्मान की केवल परछाईयां ही देख पाया हूं जबकि तिरस्कार और अपमान हर पल मुझे डसते रहते हैं। यह डंक और यह पीड़ा मुझे उनसे मिलती है जो ‘धर्म परिवर्तन‘ के विरूद्ध स्वर मुखर करते रहते हैं। उनकी गल्ती भी मैं नहीं मानता ‘हिंदू ग्रंथ‘ उनका मन ऐसा ही बना देते हैं। जिसे वे धर्म समझते हैं वही मेरी और मेरे समाज की पीड़ा का मूल कारण है जिसे मैं समय के साथ नष्ट होते हुए देखने का सोने जैसा अवसर पाकर खुश हूं। अपनी खुशी को SHARE करने के लिए ही मैंने यह ब्लाग बनाया है और जो मैंने जिस समाज से पाया है वही उस समाज को लौटा रहा हूं। जो सच देखा है भोगा है जाना है समझा है वही आपको बता रहा हूं। सच को झेलना हरेक के बस की बात नहीं है और विशेषकर आप जैसे धंुधग्रस्त के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। मुझे पता है कि हिंदू परंपराओं के रखवालों ने टीवी चैनल्स तक पर हमले किये हैं। बाबा साहब की ‘द रिडल्स आॅफ हिंदूइज्म‘ पर भी बैन लगवाया है। आज भी स्थिति बहुत अधिक बदली नहीं है इसीलिये सामने नहीं आ सकता और किसी ब्लागर के लिये सबके सामने आना जरूरी भी नहीं है।
आपके सामने आने के आग्रह से संदेह होता। क्या करेंगे आप मुझे अपने सामने पाकर या लाकर ?
आप मेरी बात देखिये , आप मेरे तर्क देखिये , आप भी अपने तर्क लाईये और बताईये कि आपने दलितों को कितना अपनापन और सम्मान मिला है।कैरानवी के समुदाय से मुझे कभी अपमान नहीं मिला , कभी उनके साथ बैठकर आत्म ग्लानि का अहसास नहीं हुआ। मैं कैरानवी को तो नहीं जानता लेकिन उनके भाई बंधुओं के बर्ताव को मैंने करीब से देखा है।उनकी ज्यादा तारीफ इस डर से नहीं करूंगा कि अब मुझे कोई अन्य मुस्लिम कह दिया जाएगा । बस इतना कहना चाहूंंगा कि मैं केवल मैं हूं अन्य नहीं । आने वाला समय इसे बिल्कुल साफ कर देगा जैसे कि पानी बरसने के बाद आकाश हो जाता है।
अंत में
कैरानवी की बिरादरी से कहूंगा कि आपके भी सब काम ठीक नहीं हैं लेकिन मैं उन पर लिखकर दो मोर्चे एक साथ नहीं खोलना चाहता , इसलिए चुप हूं और मेरे समुदाय को उससे कोई लाभ भी नहीं है , हां नुक्सान अवश्य है। इसके बादईश्वर , धर्म और मरणोपरांत फल संबंधी बातों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है। कल जो भी हो लेकिन मैं आज को जीना चाहता हूं। आज का जीवन सरल हो सफल हो इसके लिए जो भी विधि हो उसे पकड़ा जाना चाहिये बाकी समस्त चीजे तज देने योग्य हैं। आओ मानवता के उत्थान और विकास के लिए वैज्ञानिक विचार पद्धति को अपनाएं।
Thursday, July 15, 2010
Wednesday, July 14, 2010
‘ब्राह्मणों ने पुराणों में क्या लिखा और स्त्री का चित्रण एक भोग्या के रूप में क्यों किया ?‘ , जानिये सवर्ण लेखकों के लेखन से.

‘ब्राह्मणों ने पुराणों में क्या लिखा और स्त्री का चित्रण एक भोग्या के रूप में क्यों किया ?‘ , जानिये सवर्ण लेखकों के लेखन से ताकि इसे दलितों का द्वेषपूर्ण साहित्य न कहा जा सके।
हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है,
‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण करता है, ‘‘बाद में प्रगति हासिल करके जब लोगों को अग्नि तैयार करने की प्रक्रिया का ज्ञान हुआ तब वे वन्य लोग अग्नि के आस-पास रतिक्रिया करते थे। किसी भी स्त्री को किसी भी पुरुष द्वारा रतिक्रिया के लिए पकड़कर ले जाना, उस काल में धर्म माना जाता था। यदि किसी स्त्री को, कोई पुरुष पकड़कर न ले जाए, तो वह स्त्री बहुत उदास होकर रोया करती थी कि उसे कोई पकड़कर नहीं ले जाता और रति सुख नहीं देता। इस प्रकार की स्त्री को पशु आदि प्राणियों से अभिगमन करने की स्वतंत्रता थी। वन्य ऋषि-पूर्वजों में स्त्री-पुरुष में समागम की ऐसी ही पद्धति रूढ़ थी।'' यह कथन निर्विवाद रूप से स्त्रियों की उसी मानसिकता का उद्घाटन करता है कि वे संभोग के लिए न केवल प्रस्तुत रहती हैं, बल्कि उनका एकमात्र अभिप्रेत यौन-तृप्ति के लिए पुरुषों को प्रेरित करना है।इस तरह के दृष्टांत वेद-पुराण इत्यादि में भी बहुततायत से उपलब्ध हैं।
यहाँ ऋग्वेद के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं -मेरे पास आकर मुझे अच्छी तरह स्पर्श करो। ऐसा मत समझना कि मैं कम रोयें वाली संभोग योग्य नहीं हूँ(यानी बालिग नहीं हूँ)। मैं गाँधारी भेड़ की तरह लोमपूर्णा (यानी गुप्तांगों पर घने रोंगटे वाली) तथा पूर्णावयवा अर्थात् पूर्ण (विकसित अधिक सटीक लगता है) अंगों वाली हूँ।(ऋ. १।१२६।७) (डॉ. तुलसीराम का लेख-बौद्ध धर्म तथा वर्ण-व्यवस्था-हँस, अगस्त २००४)कोई भी स्त्री मेरे समान सौभाग्यशालिनी एवं उत्तम पुत्र वाली नहीं है। मेरे समान कोई भी स्त्री न तो पुरुष को अपना शरीर अर्पित करने वाली है और न संभोग के समय जाँघों को फैलाने वाली है।(ऋ. १०/८६/६) ऋग्वेद-डॉ. गंगा सहाय शर्मा, संस्कृत साहित्य प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण १९८५)हे इन्द्र! तीखे सींगों वाला बैल जिस प्रकार गर्जना करता हुआ गायों में रमण करता है, उसी प्रकार तुम मेरे साथ रमण करो।(ऋ. १०/८६/१५) (वही)ब्रह्म वैवर्त पुराण में मोहिनी नामक वेश्या का आख्यान है जो ब्रह्मा से संभोग की याचना करती है और ठुकराए जाने पर उन्हें धिक्कारते हुए कहती है, ‘‘उत्तम पुरुष वह है जो बिना कहे ही, नारी की इच्छा जान, उसे खींचकर संभोग कर ले। मध्यम पुरुष वह है जो नारी के कहने पर संभोग करे और जो बार-बार कामातुर नारी के उकसाने पर भी संभोग नहीं करे, वह पुरुष नहीं, नपुंसक है।(खट्टर काका, पृ. १८८, सं. छठाँ)इतना कहने पर भी जब ब्रह्मा उत्तेजित नहीं हुए तो मोहिनी ने उन्हें अपूज्य होने का शाप दे दिया। शाप से घबराए हुए ब्रह्मा जब विष्णु भगवान से फ़रियाद करने पहुँचे तो उन्होंने डाँटते हुए नसीहत दिया, ‘‘यदि संयोगवश कोई कामातुर एकांत में आकर स्वयं उपस्थित हो जाए तो उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो कामार्त्ता स्त्री का ऐसा अपमान करता है, वह निश्चय ही अपराधी है। (खट्टर काका, पृष्ठ १८९) लक्ष्मी भी बरस पड़ीं, ‘‘जब वेश्या ने स्वयं मुँह खोलकर संभोग की याचना की तब ब्रह्मा ने क्यों नहीं उसकी इच्छा पूरी की? यह नारी का महान् अपमान हुआ।'' ऐसा कहते हुए लक्ष्मी ने भी वेश्या के शाप की पुष्टि कर दी।(वही, पृष्ठ १८९)विष्णु के कृष्णावतार के रूप में स्त्री-भोग का अटूट रिकार्ड स्थापित करके अपनी नसीहत को पूरा करके दिखा दिया। ब्रह्म वैवर्त में राधा-कृष्ण संभोग का जो वीभत्स दृश्य है उसका वर्णन डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी' ने अपने लेख ‘कृष्ण और राधा' में करने के बाद अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में व्यक्त किया है, ‘‘पता नहीं, राधा कृष्ण संभोग करते थे या लड़ाई लड़ते थे कि एक संभोग के बाद बेचारी राधा लहूलुहान हो जाती थी। उसके नितंब, स्तन और अधर बुरी तरह घायल हो जाते। राधा मरहम पट्टी का सामान साथ रखती होगी। राधा इतनी घायल होने पर प्रति रात कैसे संभोग कराती थी, इसे बेचारी वही जाने। (सरिता, मुक्ता रिप्रिंट भाग-२) इस प्रतिक्रिया में जो बात कहने को छूट गयी वह यह है कि इस हिंसक संभोग, जिसे बलात्कार कहना ज्यादा उचित है, से राधा प्रसन्न होती थी जिससे यही लगता है कि स्त्रियाँ बलात्कृत होना चाहती हैं।History of prostitution in india के पृष्ठ १४७ पर पद्म पुराण के उद्धृत यह आख्यान प्रश्नगत प्रसंग में संदर्भित करने योग्य है। एक विधवा क्षत्राणी जो कि पूर्व रानी होती है, किसी वेद-पारंगत ब्राह्मण पर आसक्त होकर समर्पण करने के उद्देश्य से एकांत में उसके पास जाती है लेकिन ब्राह्मण इनकार कर देता है। इस पर विधवा यह सोचती है कि यदि वह उस ब्राह्मण के द्वारा बेहोशी का नाटक करे तो वह उसको ज+रूर अपनी बाँहों में उठा लेगा और तब वह उसे गले में हाथ डालकर और अपने अंगों को प्रदर्शित व स्पर्श कराकर उसे उत्तेजित कर देगी और अपने उद्देश्य में सफल हो जाएगी। निम्न श्लोक उसकी सोच को उद्घाटित करते हैं - सुस्निग्ध रोम रहितं पक्वाश्वत्थदलाकृति।/दर्शयिष्यामितद्स्थानम् कामगेहो सुगन्धि च॥मैं उसको पूर्ण विकसित पीपल के पत्ते की आकार की रोम रहित मृदुल और सुगंधित काम गेह(योनि) को (किसी न किसी तरह से) दिखा दूँगी क्योंकि - बाहूमूल कूचद्वंन्दू योनिस्पर्शन दर्शनात्।/कस्य न स्ख़लते चिन्तं रेतः स्कन्नच नो भवेत्॥यह निश्चित है कि ऐसा कोई भी पुरुष नहीं है जिसका वीर्य किसी के बाहु-युगल, स्तन-द्वय और योनि को छूने और देखने से स्खलित न होता हो।ये कुछ दृष्टांत हैं स्त्रियों के काम-सापेक्ष प्रवृत्ति की निर्द्वन्द्व स्वच्छंदता के, जो वर्तमान नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में गहन वैचारिक मंथन की मांग करते हैं।
Monday, June 28, 2010
नपुंसक वृद्ध राजा दशरथ ने तीन पुरोहितों से ''अपनी तीनों रानियों से सम्भोग करने की प्रार्थना की।'' - पेरियार रामायण
http://www.tadbhav.com/dalit_issue/tasber_ka_dusra.html#tasber तद्भव से साभार
पेरियार रामायण इस दृष्टि से अस्मितामूलक अध्ययन की प्रस्तावना भी है। समस्या केवल यह है कि उसमें पौराणिक कथाओं के विखंडन के साथ साथ प्रतिशोध की उत्तेजना भी है जिसके चलते वह बहुत से अनर्गल ब्योरों में जा फंसती है। उदाहरण के लिए पेरियार भी विष्णु के घृणित अनैतिक चरित्रा का उल्लेख करते हैं। (दे. पृ. 9-10) राम, दशरथ, कौशल्या आदि के भी छल, पाखंड, अन्याय का वर्णन करते हैं। इसके लिए विभिन्न राम कथाओं और आधुनिक शोधों का उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से उनका कार्य विद्वतापूर्ण है लेकिन पूर्व निश्चित या प्रचलित धारणाओं को उलटने की धुन में पेरियार अतिवाद तक जाते हैं। एक उदाहरण देखें। कौशल्या आदि मां कैसे बनीं?पेरियार रामायण इस दृष्टि से अस्मितामूलक अध्ययन की प्रस्तावना भी है। समस्या केवल यह है कि उसमें पौराणिक कथाओं के विखंडन के साथ साथ प्रतिशोध की उत्तेजना भी है जिसके चलते वह बहुत से अनर्गल ब्योरों में जा फंसती है। उदाहरण के लिए पेरियार भी विष्णु के घृणित अनैतिक चरित्रा का उल्लेख करते हैं। (दे. पृ. 9-10) राम, दशरथ, कौशल्या आदि के भी छल, पाखंड, अन्याय का वर्णन करते हैं। इसके लिए विभिन्न राम कथाओं और आधुनिक शोधों का उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से उनका कार्य विद्वतापूर्ण है लेकिन पूर्व निश्चित या प्रचलित धारणाओं को उलटने की धुन में पेरियार अतिवाद तक जाते हैं। एक उदाहरण देखें। कौशल्या आदि मां कैसे बनीं? दशरथ से? यज्ञ से? नहीं; दशरथ ने होता, अवयवु और युवध नामक तीन पुरोहितों से ''अपनी तीनों रानियों से सम्भोग करने की प्रार्थना की।'' पुरोहितों ने ''अपने अभिलषित समय तक उनके साथ यथेच्छ सम्भोग करके उन्हें राजा दशरथ को वापस कर दी।'' (पृ. 11) ऐसे वर्णन न तथ्यपूर्ण कहे जायेंगे, न अस्मितामूलक, बल्कि कुत्सापूर्ण कहे जाऐंगे। ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था में दलितों के साथ स्त्रिायां भी उत्पीड़ित हुई हैं। कौशल्या आदि को उनका वृद्ध नपुंसक पति अगर पुरोहितों को समर्पित करता है और पुरोहित उन रानियों से यथेच्छ सम्भोग करते हैं तो इससे स्त्राी की परवशता ही साबित होती है। दलित स्त्राीवाद ने जिसे ढांचे का विकास किया है, वह पेरियार की इस दृष्टि से बहुत अलग है। पेरियार का नजरिया उनके उपशीर्षकों से भी समझ में आता है, ÷दशरथ का कमीनापन' (पृ. 33), ÷सीता की मूर्खता', (पृ. 35), ÷रावण की महानता' (पृ. 38), इत्यादि। इस पक्षधर लेखन की प्रकृति को पूरी तरह समझने के लिए, दशरथ के उक्त कमीनेपन के विपरीत, रावण के प्रति पेरियार की हमदर्दी का उदाहरण भी देखना चाहिए। (कृपया नीचे उद्धृत अंश में अनुवाद की भ्रष्टता के लिए पेरियार को दोषी न समझें!) उनका कहना हैᄉ ''यदि हम रावण के प्रति निर्दिष्ट उस अभियोग का मामला, कि उसने सीता का स्त्राीत्व भ्रष्ट किया। वह उसे छल से ले गया। खुफिया विभाग के किसी अधिकारी को अनुसंधान के लिए सौंप दें। तथा खुफिया विभाग की रिपोर्ट किसी निष्पक्ष न्यायाधीश के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत की जाय और यदि राम को अभियोगी तथा रावण को अभियुक्त समझ कर राम की सुविधानुसार ही मामले का निर्णय किया जायᄉ तो हमें पूर्ण विश्वास है, कि न्यायाधीश रावण के पक्ष में ही अपना यह निर्णय देगा कि रावण निर्दोष तथा निष्कलंक है। उसे डरा व धमका कर निष्प्रयोजन फांस दिया।'' (पृ. 44) जांच अधिकारी, वकील और निष्पक्ष न्यायाधीश की सारी जिम्मेदारियां मानो पेरियार ने खुद ही सम्भाल ली हैं! ऐसी ÷आलोचना' का सामाजिक या सांस्कृतिक दृष्टि से क्या उद्देश्य है? यह शोधपूर्ण हो सकती है, तार्किक नहीं है। शुरू में पेरियार ने कहा थाᄉ ''राम और सीता में किसी प्रकार की कोई दैवी तथा स्वर्गीय शक्ति नहीं है।'' (पृ. 6) लेकिन रावण को निर्दोष तथा निष्कलंक सिद्ध करने के लिए जांच अधिकारी की हैसियत से वे पुराण कथाओं पर विश्वास कर बैठते हैं। उसका व्यभिचार न्यायसंगत है क्योंकि विष्णु ने जलंधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व नष्ट किया था, बदले में वृंदा ने शाप दिया था कि ''ठीक यही दुःखद घटना तेरी स्त्राी के प्रति हो।'' (पृ. 52) अगर सीताहरण पूर्वजन्म के अभिशाप के कारण हुआ तो कथा में दैवीतत्व निहित मानना पड़ेगा। तर्क के बदले उत्तेजना से किये गये इस अध्ययन को आस्था की प्रतिलोम राजनीति कहा जा सकता है! यह ÷राजनीति' उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान में सहायक नहीं होती। विद्वानों के इस चिन्तन से साधारण दलित लेखकों की समझ इसी बिन्दु पर अलग ही नहीं होती, श्रेष्ठ भी ठहरती है।सवर्ण आस्था हो या दलित आस्था, वे परस्पर पूरक हैं। उसका विकल्प है तार्किक ऐतिहासिक दृष्टिकोण। बुल्के ने रामकथा के सभी रूपों का विस्तृत अवगाहन करके यह सुचिन्तित निष्कर्ष प्रस्तुुत किया है कि ''....विभिन्न नागरिक समुदाय का विभिन्न रामायणों आदि में विश्वास है। इससे स्पष्ट है कि करोड़ों की आबादी वाले भारत में किसी भी ग्रंथ से किसी व्यक्ति या नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आज तक न तो कोई चोट पहुंची है, न अपमान हुआ है और भविष्य में भी न तो चोट पहुंचेगी, न अपमान होगा। इसका सबसे बड़ा साक्ष्य यह है कि आज तक इस बीमारी में किसी भी व्यक्ति का न हार्ट फेल हुआ न मरा। आदि आदि।.... वास्तव में किसी भी व्यक्ति के विश्वास को न चोट पहुंचती है आर न अपमान होता है, बल्कि कुछ धूर्त राजनीतिक नेता सत्ता हथियाने और सामाजिक नेता झूठा बड़प्पन प्राप्त करने के लिए गरीबों और कमअक्ल लोगों को बरगला कर बवंडर खड़ा करके अपने स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। जागृत समाज को चाहिए कि उपरोक्त ऐसे दम्भी नेताओं की बातों में कभी न आयें।.... किसी बात को तब मानिये जब वह बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरे।'' (सच्ची रामायण की चाभीः राम कथा, कल्चरल पब्लिशर्स, लखनऊ, प्रथम बार (हिन्दी) सन् 1971, पृ. 60) से? यज्ञ से? नहीं; दशरथ ने होता, अवयवु और युवध नामक तीन पुरोहितों से ''अपनी तीनों रानियों से सम्भोग करने की प्रार्थना की।'' पुरोहितों ने ''अपने अभिलषित समय तक उनके साथ यथेच्छ सम्भोग करके उन्हें राजा दशरथ को वापस कर दी।'' (पृ. 11) ऐसे वर्णन न तथ्यपूर्ण कहे जायेंगे, न अस्मितामूलक, बल्कि कुत्सापूर्ण कहे जाऐंगे। ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था में दलितों के साथ स्त्रिायां भी उत्पीड़ित हुई हैं। कौशल्या आदि को उनका वृद्ध नपुंसक पति अगर पुरोहितों को समर्पित करता है और पुरोहित उन रानियों से यथेच्छ सम्भोग करते हैं तो इससे स्त्राी की परवशता ही साबित होती है। दलित स्त्राीवाद ने जिसे ढांचे का विकास किया है, वह पेरियार की इस दृष्टि से बहुत अलग है। पेरियार का नजरिया उनके उपशीर्षकों से भी समझ में आता है, ÷दशरथ का कमीनापन' (पृ. 33), ÷सीता की मूर्खता', (पृ. 35), ÷रावण की महानता' (पृ. 38), इत्यादि। इस पक्षधर लेखन की प्रकृति को पूरी तरह समझने के लिए, दशरथ के उक्त कमीनेपन के विपरीत, रावण के प्रति पेरियार की हमदर्दी का उदाहरण भी देखना चाहिए। (कृपया नीचे उद्धृत अंश में अनुवाद की भ्रष्टता के लिए पेरियार को दोषी न समझें!) उनका कहना हैᄉ ''यदि हम रावण के प्रति निर्दिष्ट उस अभियोग का मामला, कि उसने सीता का स्त्राीत्व भ्रष्ट किया। वह उसे छल से ले गया। खुफिया विभाग के किसी अधिकारी को अनुसंधान के लिए सौंप दें। तथा खुफिया विभाग की रिपोर्ट किसी निष्पक्ष न्यायाधीश के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत की जाय और यदि राम को अभियोगी तथा रावण को अभियुक्त समझ कर राम की सुविधानुसार ही मामले का निर्णय किया जायᄉ तो हमें पूर्ण विश्वास है, कि न्यायाधीश रावण के पक्ष में ही अपना यह निर्णय देगा कि रावण निर्दोष तथा निष्कलंक है। उसे डरा व धमका कर निष्प्रयोजन फांस दिया।'' (पृ. 44) जांच अधिकारी, वकील और निष्पक्ष न्यायाधीश की सारी जिम्मेदारियां मानो पेरियार ने खुद ही सम्भाल ली हैं! ऐसी ÷आलोचना' का सामाजिक या सांस्कृतिक दृष्टि से क्या उद्देश्य है? यह शोधपूर्ण हो सकती है, तार्किक नहीं है। शुरू में पेरियार ने कहा थाᄉ ''राम और सीता में किसी प्रकार की कोई दैवी तथा स्वर्गीय शक्ति नहीं है।'' (पृ. 6) लेकिन रावण को निर्दोष तथा निष्कलंक सिद्ध करने के लिए जांच अधिकारी की हैसियत से वे पुराण कथाओं पर विश्वास कर बैठते हैं। उसका व्यभिचार न्यायसंगत है क्योंकि विष्णु ने जलंधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व नष्ट किया था, बदले में वृंदा ने शाप दिया था कि ''ठीक यही दुःखद घटना तेरी स्त्राी के प्रति हो।'' (पृ. 52) अगर सीताहरण पूर्वजन्म के अभिशाप के कारण हुआ तो कथा में दैवीतत्व निहित मानना पड़ेगा। तर्क के बदले उत्तेजना से किये गये इस अध्ययन को आस्था की प्रतिलोम राजनीति कहा जा सकता है! यह ÷राजनीति' उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान में सहायक नहीं होती। विद्वानों के इस चिन्तन से साधारण दलित लेखकों की समझ इसी बिन्दु पर अलग ही नहीं होती, श्रेष्ठ भी ठहरती है।सवर्ण आस्था हो या दलित आस्था, वे परस्पर पूरक हैं। उसका विकल्प है तार्किक ऐतिहासिक दृष्टिकोण। बुल्के ने रामकथा के सभी रूपों का विस्तृत अवगाहन करके यह सुचिन्तित निष्कर्ष प्रस्तुुत किया है कि ''....विभिन्न नागरिक समुदाय का विभिन्न रामायणों आदि में विश्वास है। इससे स्पष्ट है कि करोड़ों की आबादी वाले भारत में किसी भी ग्रंथ से किसी व्यक्ति या नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आज तक न तो कोई चोट पहुंची है, न अपमान हुआ है और भविष्य में भी न तो चोट पहुंचेगी, न अपमान होगा। इसका सबसे बड़ा साक्ष्य यह है कि आज तक इस बीमारी में किसी भी व्यक्ति का न हार्ट फेल हुआ न मरा। आदि आदि।.... वास्तव में किसी भी व्यक्ति के विश्वास को न चोट पहुंचती है आर न अपमान होता है, बल्कि कुछ धूर्त राजनीतिक नेता सत्ता हथियाने और सामाजिक नेता झूठा बड़प्पन प्राप्त करने के लिए गरीबों और कमअक्ल लोगों को बरगला कर बवंडर खड़ा करके अपने स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। जागृत समाज को चाहिए कि उपरोक्त ऐसे दम्भी नेताओं की बातों में कभी न आयें।.... किसी बात को तब मानिये जब वह बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरे।'' (सच्ची रामायण की चाभीः राम कथा, कल्चरल पब्लिशर्स, लखनऊ, प्रथम बार (हिन्दी) सन् 1971, पृ. 60)
पेरियार रामायण इस दृष्टि से अस्मितामूलक अध्ययन की प्रस्तावना भी है। समस्या केवल यह है कि उसमें पौराणिक कथाओं के विखंडन के साथ साथ प्रतिशोध की उत्तेजना भी है जिसके चलते वह बहुत से अनर्गल ब्योरों में जा फंसती है। उदाहरण के लिए पेरियार भी विष्णु के घृणित अनैतिक चरित्रा का उल्लेख करते हैं। (दे. पृ. 9-10) राम, दशरथ, कौशल्या आदि के भी छल, पाखंड, अन्याय का वर्णन करते हैं। इसके लिए विभिन्न राम कथाओं और आधुनिक शोधों का उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से उनका कार्य विद्वतापूर्ण है लेकिन पूर्व निश्चित या प्रचलित धारणाओं को उलटने की धुन में पेरियार अतिवाद तक जाते हैं। एक उदाहरण देखें। कौशल्या आदि मां कैसे बनीं?पेरियार रामायण इस दृष्टि से अस्मितामूलक अध्ययन की प्रस्तावना भी है। समस्या केवल यह है कि उसमें पौराणिक कथाओं के विखंडन के साथ साथ प्रतिशोध की उत्तेजना भी है जिसके चलते वह बहुत से अनर्गल ब्योरों में जा फंसती है। उदाहरण के लिए पेरियार भी विष्णु के घृणित अनैतिक चरित्रा का उल्लेख करते हैं। (दे. पृ. 9-10) राम, दशरथ, कौशल्या आदि के भी छल, पाखंड, अन्याय का वर्णन करते हैं। इसके लिए विभिन्न राम कथाओं और आधुनिक शोधों का उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से उनका कार्य विद्वतापूर्ण है लेकिन पूर्व निश्चित या प्रचलित धारणाओं को उलटने की धुन में पेरियार अतिवाद तक जाते हैं। एक उदाहरण देखें। कौशल्या आदि मां कैसे बनीं? दशरथ से? यज्ञ से? नहीं; दशरथ ने होता, अवयवु और युवध नामक तीन पुरोहितों से ''अपनी तीनों रानियों से सम्भोग करने की प्रार्थना की।'' पुरोहितों ने ''अपने अभिलषित समय तक उनके साथ यथेच्छ सम्भोग करके उन्हें राजा दशरथ को वापस कर दी।'' (पृ. 11) ऐसे वर्णन न तथ्यपूर्ण कहे जायेंगे, न अस्मितामूलक, बल्कि कुत्सापूर्ण कहे जाऐंगे। ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था में दलितों के साथ स्त्रिायां भी उत्पीड़ित हुई हैं। कौशल्या आदि को उनका वृद्ध नपुंसक पति अगर पुरोहितों को समर्पित करता है और पुरोहित उन रानियों से यथेच्छ सम्भोग करते हैं तो इससे स्त्राी की परवशता ही साबित होती है। दलित स्त्राीवाद ने जिसे ढांचे का विकास किया है, वह पेरियार की इस दृष्टि से बहुत अलग है। पेरियार का नजरिया उनके उपशीर्षकों से भी समझ में आता है, ÷दशरथ का कमीनापन' (पृ. 33), ÷सीता की मूर्खता', (पृ. 35), ÷रावण की महानता' (पृ. 38), इत्यादि। इस पक्षधर लेखन की प्रकृति को पूरी तरह समझने के लिए, दशरथ के उक्त कमीनेपन के विपरीत, रावण के प्रति पेरियार की हमदर्दी का उदाहरण भी देखना चाहिए। (कृपया नीचे उद्धृत अंश में अनुवाद की भ्रष्टता के लिए पेरियार को दोषी न समझें!) उनका कहना हैᄉ ''यदि हम रावण के प्रति निर्दिष्ट उस अभियोग का मामला, कि उसने सीता का स्त्राीत्व भ्रष्ट किया। वह उसे छल से ले गया। खुफिया विभाग के किसी अधिकारी को अनुसंधान के लिए सौंप दें। तथा खुफिया विभाग की रिपोर्ट किसी निष्पक्ष न्यायाधीश के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत की जाय और यदि राम को अभियोगी तथा रावण को अभियुक्त समझ कर राम की सुविधानुसार ही मामले का निर्णय किया जायᄉ तो हमें पूर्ण विश्वास है, कि न्यायाधीश रावण के पक्ष में ही अपना यह निर्णय देगा कि रावण निर्दोष तथा निष्कलंक है। उसे डरा व धमका कर निष्प्रयोजन फांस दिया।'' (पृ. 44) जांच अधिकारी, वकील और निष्पक्ष न्यायाधीश की सारी जिम्मेदारियां मानो पेरियार ने खुद ही सम्भाल ली हैं! ऐसी ÷आलोचना' का सामाजिक या सांस्कृतिक दृष्टि से क्या उद्देश्य है? यह शोधपूर्ण हो सकती है, तार्किक नहीं है। शुरू में पेरियार ने कहा थाᄉ ''राम और सीता में किसी प्रकार की कोई दैवी तथा स्वर्गीय शक्ति नहीं है।'' (पृ. 6) लेकिन रावण को निर्दोष तथा निष्कलंक सिद्ध करने के लिए जांच अधिकारी की हैसियत से वे पुराण कथाओं पर विश्वास कर बैठते हैं। उसका व्यभिचार न्यायसंगत है क्योंकि विष्णु ने जलंधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व नष्ट किया था, बदले में वृंदा ने शाप दिया था कि ''ठीक यही दुःखद घटना तेरी स्त्राी के प्रति हो।'' (पृ. 52) अगर सीताहरण पूर्वजन्म के अभिशाप के कारण हुआ तो कथा में दैवीतत्व निहित मानना पड़ेगा। तर्क के बदले उत्तेजना से किये गये इस अध्ययन को आस्था की प्रतिलोम राजनीति कहा जा सकता है! यह ÷राजनीति' उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान में सहायक नहीं होती। विद्वानों के इस चिन्तन से साधारण दलित लेखकों की समझ इसी बिन्दु पर अलग ही नहीं होती, श्रेष्ठ भी ठहरती है।सवर्ण आस्था हो या दलित आस्था, वे परस्पर पूरक हैं। उसका विकल्प है तार्किक ऐतिहासिक दृष्टिकोण। बुल्के ने रामकथा के सभी रूपों का विस्तृत अवगाहन करके यह सुचिन्तित निष्कर्ष प्रस्तुुत किया है कि ''....विभिन्न नागरिक समुदाय का विभिन्न रामायणों आदि में विश्वास है। इससे स्पष्ट है कि करोड़ों की आबादी वाले भारत में किसी भी ग्रंथ से किसी व्यक्ति या नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आज तक न तो कोई चोट पहुंची है, न अपमान हुआ है और भविष्य में भी न तो चोट पहुंचेगी, न अपमान होगा। इसका सबसे बड़ा साक्ष्य यह है कि आज तक इस बीमारी में किसी भी व्यक्ति का न हार्ट फेल हुआ न मरा। आदि आदि।.... वास्तव में किसी भी व्यक्ति के विश्वास को न चोट पहुंचती है आर न अपमान होता है, बल्कि कुछ धूर्त राजनीतिक नेता सत्ता हथियाने और सामाजिक नेता झूठा बड़प्पन प्राप्त करने के लिए गरीबों और कमअक्ल लोगों को बरगला कर बवंडर खड़ा करके अपने स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। जागृत समाज को चाहिए कि उपरोक्त ऐसे दम्भी नेताओं की बातों में कभी न आयें।.... किसी बात को तब मानिये जब वह बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरे।'' (सच्ची रामायण की चाभीः राम कथा, कल्चरल पब्लिशर्स, लखनऊ, प्रथम बार (हिन्दी) सन् 1971, पृ. 60) से? यज्ञ से? नहीं; दशरथ ने होता, अवयवु और युवध नामक तीन पुरोहितों से ''अपनी तीनों रानियों से सम्भोग करने की प्रार्थना की।'' पुरोहितों ने ''अपने अभिलषित समय तक उनके साथ यथेच्छ सम्भोग करके उन्हें राजा दशरथ को वापस कर दी।'' (पृ. 11) ऐसे वर्णन न तथ्यपूर्ण कहे जायेंगे, न अस्मितामूलक, बल्कि कुत्सापूर्ण कहे जाऐंगे। ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यवस्था में दलितों के साथ स्त्रिायां भी उत्पीड़ित हुई हैं। कौशल्या आदि को उनका वृद्ध नपुंसक पति अगर पुरोहितों को समर्पित करता है और पुरोहित उन रानियों से यथेच्छ सम्भोग करते हैं तो इससे स्त्राी की परवशता ही साबित होती है। दलित स्त्राीवाद ने जिसे ढांचे का विकास किया है, वह पेरियार की इस दृष्टि से बहुत अलग है। पेरियार का नजरिया उनके उपशीर्षकों से भी समझ में आता है, ÷दशरथ का कमीनापन' (पृ. 33), ÷सीता की मूर्खता', (पृ. 35), ÷रावण की महानता' (पृ. 38), इत्यादि। इस पक्षधर लेखन की प्रकृति को पूरी तरह समझने के लिए, दशरथ के उक्त कमीनेपन के विपरीत, रावण के प्रति पेरियार की हमदर्दी का उदाहरण भी देखना चाहिए। (कृपया नीचे उद्धृत अंश में अनुवाद की भ्रष्टता के लिए पेरियार को दोषी न समझें!) उनका कहना हैᄉ ''यदि हम रावण के प्रति निर्दिष्ट उस अभियोग का मामला, कि उसने सीता का स्त्राीत्व भ्रष्ट किया। वह उसे छल से ले गया। खुफिया विभाग के किसी अधिकारी को अनुसंधान के लिए सौंप दें। तथा खुफिया विभाग की रिपोर्ट किसी निष्पक्ष न्यायाधीश के समक्ष निर्णय के लिए प्रस्तुत की जाय और यदि राम को अभियोगी तथा रावण को अभियुक्त समझ कर राम की सुविधानुसार ही मामले का निर्णय किया जायᄉ तो हमें पूर्ण विश्वास है, कि न्यायाधीश रावण के पक्ष में ही अपना यह निर्णय देगा कि रावण निर्दोष तथा निष्कलंक है। उसे डरा व धमका कर निष्प्रयोजन फांस दिया।'' (पृ. 44) जांच अधिकारी, वकील और निष्पक्ष न्यायाधीश की सारी जिम्मेदारियां मानो पेरियार ने खुद ही सम्भाल ली हैं! ऐसी ÷आलोचना' का सामाजिक या सांस्कृतिक दृष्टि से क्या उद्देश्य है? यह शोधपूर्ण हो सकती है, तार्किक नहीं है। शुरू में पेरियार ने कहा थाᄉ ''राम और सीता में किसी प्रकार की कोई दैवी तथा स्वर्गीय शक्ति नहीं है।'' (पृ. 6) लेकिन रावण को निर्दोष तथा निष्कलंक सिद्ध करने के लिए जांच अधिकारी की हैसियत से वे पुराण कथाओं पर विश्वास कर बैठते हैं। उसका व्यभिचार न्यायसंगत है क्योंकि विष्णु ने जलंधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व नष्ट किया था, बदले में वृंदा ने शाप दिया था कि ''ठीक यही दुःखद घटना तेरी स्त्राी के प्रति हो।'' (पृ. 52) अगर सीताहरण पूर्वजन्म के अभिशाप के कारण हुआ तो कथा में दैवीतत्व निहित मानना पड़ेगा। तर्क के बदले उत्तेजना से किये गये इस अध्ययन को आस्था की प्रतिलोम राजनीति कहा जा सकता है! यह ÷राजनीति' उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान में सहायक नहीं होती। विद्वानों के इस चिन्तन से साधारण दलित लेखकों की समझ इसी बिन्दु पर अलग ही नहीं होती, श्रेष्ठ भी ठहरती है।सवर्ण आस्था हो या दलित आस्था, वे परस्पर पूरक हैं। उसका विकल्प है तार्किक ऐतिहासिक दृष्टिकोण। बुल्के ने रामकथा के सभी रूपों का विस्तृत अवगाहन करके यह सुचिन्तित निष्कर्ष प्रस्तुुत किया है कि ''....विभिन्न नागरिक समुदाय का विभिन्न रामायणों आदि में विश्वास है। इससे स्पष्ट है कि करोड़ों की आबादी वाले भारत में किसी भी ग्रंथ से किसी व्यक्ति या नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आज तक न तो कोई चोट पहुंची है, न अपमान हुआ है और भविष्य में भी न तो चोट पहुंचेगी, न अपमान होगा। इसका सबसे बड़ा साक्ष्य यह है कि आज तक इस बीमारी में किसी भी व्यक्ति का न हार्ट फेल हुआ न मरा। आदि आदि।.... वास्तव में किसी भी व्यक्ति के विश्वास को न चोट पहुंचती है आर न अपमान होता है, बल्कि कुछ धूर्त राजनीतिक नेता सत्ता हथियाने और सामाजिक नेता झूठा बड़प्पन प्राप्त करने के लिए गरीबों और कमअक्ल लोगों को बरगला कर बवंडर खड़ा करके अपने स्वार्थ की सिद्धि करते हैं। जागृत समाज को चाहिए कि उपरोक्त ऐसे दम्भी नेताओं की बातों में कभी न आयें।.... किसी बात को तब मानिये जब वह बात तर्क की कसौटी पर खरी उतरे।'' (सच्ची रामायण की चाभीः राम कथा, कल्चरल पब्लिशर्स, लखनऊ, प्रथम बार (हिन्दी) सन् 1971, पृ. 60)
Sunday, June 27, 2010
शम्बूक हत्या वाला रामराज्य लौटने की कवायद क्यों ?

Ramayana Stories 17
From Spiritual India
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रामायण - उत्तरकाण्ड - ब्राह्मण बालक की मृत्यु
http://www.spiritualindia.org/wiki/Ramayana_Stories_17 से साभार
एक दिन श्रीराम अपने दरबार में बैठे थे तभी एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुये पुत्र का शव लेकर राजद्वार पर आया और 'हा पुत्र!' 'हा पुत्र!' कहकर विलाप करते हुये कहने लगा, "मैंने पूर्वजन्म में कौन से पाप किये थे जिससे मुझे अपनी आँखों से अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु देखनी पड़ी। केवल तेरह वर्ष दस महीने और बीस दिन की आयु में ही तू मुझे छोड़कर सिधार गया। मैंने इस जन्में कोई पाप या मिथ्या-भाषण भी नहीं किया। फिर तेरी अकाल मृत्यु क्यों हुई? इस राज्य में ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं हुई। निःसन्देह यह श्रीराम के ही किसी दुष्कर्म का फल है। उनके राज्य में ऐसी दुर्घटना घटी है। यदि श्रीराम ने तुझे जीवित नहीं किया तो हम स्त्री-पुरुष यहीं राजद्वार पर भूखे-प्यासे रहकर अपने प्राण त्याग देंगे। श्रीराम! फिर तुम इस ब्रह्महत्या का पाप लेकर सुखी रहना। राजा के दोष से जब प्रजा का विधिवत पालन नहीं होता तभी प्रजा को ऐसी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इससे स्पष्ट है कि राजा से ही कहीं कोई अपराध हुआ है।" इस प्रकार की बातें करता हुआ वह विलाप करने लगा।
जब श्रीरामचन्द्रजी इस विषय पर मनन कर रहे थे तभी वशिष्ठजी आठ ऋषि-मुनियों के साथ दरबार में पधारे। उनमें नारद जी भी थे। श्री राम ने जब यह समस्या उनके सम्मुख रखी तो नारद जी बोले, "राजन्! जिस कारण से इस बालक की अकाल मृत्यु हुई वह मैं आपको बताता हूँ। सतयुग में केवल ब्राह्मण ही तपस्या किया करते थे। फिर त्रेता के प्रारम्भ में क्षत्रियों को भी तपस्या का अधिकार मिल गया। अन्य वर्णों का तपस्या में रत होना अधर्म है। हे राजन्! निश्चय ही आपके राज्य में कोई शूद्र वर्ण का मनुष्य तपस्या कर रहा है, उसी से इस बालक की मृत्यु हुई है। इसलिये आप खोज कराइये कि आपके राज्य में कोई व्यक्ति कर्तव्यों की सीमा का उल्लंघन तो नहीं कर रहा। इस बीच ब्राह्मण के इस बालक को सुरक्षित रखने की व्यवस्था कराइये।"
नारदजी की बात सुनकर उन्होंने ऐसा ही किया। एक ओर सेवकों को इस बात का पता लगाने के लिये भेजा कि कोई अवांछित व्यक्ति ऐसा कार्य तो नहीं कर रहा जो उसे नहीं करना चाहिये। दूसरी ओर विप्र पुत्र के शरीर की सुरक्षा का प्रबन्ध कराया। वे स्वयं भी पुष्पक विमान में बैठकर ऐसे व्यक्ति की खोज में निकल पड़े। पुष्पक उन्हें दक्षिण दिशा में स्थित शैवाल पर्वत पर बने एक सरोवर पर ले गया जहाँ एक तपस्वी नीचे की ओर मुख करके उल्टा लटका हुआ भयंकर तपस्या कर रहा था। उसकी यह विकट तपस्या देख कर उन्होंने पूछा, "हे तपस्वी! तुम कौन हो? किस वर्ण के हो और यह भयंकर तपस्या क्यों कर रहे हो?"
यह सुनकर वह तपस्वी बोले, "महात्मन्! मैं शूद्र योनि से उत्पन्न हूँ और सशरीर स्वर्ग जाने के लिये यह उग्र तपस्या कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बूक है।"
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रामायण - उत्तरकाण्ड - ब्राह्मण बालक की मृत्यु
http://www.spiritualindia.org/wiki/Ramayana_Stories_17 से साभार
एक दिन श्रीराम अपने दरबार में बैठे थे तभी एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुये पुत्र का शव लेकर राजद्वार पर आया और 'हा पुत्र!' 'हा पुत्र!' कहकर विलाप करते हुये कहने लगा, "मैंने पूर्वजन्म में कौन से पाप किये थे जिससे मुझे अपनी आँखों से अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु देखनी पड़ी। केवल तेरह वर्ष दस महीने और बीस दिन की आयु में ही तू मुझे छोड़कर सिधार गया। मैंने इस जन्में कोई पाप या मिथ्या-भाषण भी नहीं किया। फिर तेरी अकाल मृत्यु क्यों हुई? इस राज्य में ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं हुई। निःसन्देह यह श्रीराम के ही किसी दुष्कर्म का फल है। उनके राज्य में ऐसी दुर्घटना घटी है। यदि श्रीराम ने तुझे जीवित नहीं किया तो हम स्त्री-पुरुष यहीं राजद्वार पर भूखे-प्यासे रहकर अपने प्राण त्याग देंगे। श्रीराम! फिर तुम इस ब्रह्महत्या का पाप लेकर सुखी रहना। राजा के दोष से जब प्रजा का विधिवत पालन नहीं होता तभी प्रजा को ऐसी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इससे स्पष्ट है कि राजा से ही कहीं कोई अपराध हुआ है।" इस प्रकार की बातें करता हुआ वह विलाप करने लगा।
जब श्रीरामचन्द्रजी इस विषय पर मनन कर रहे थे तभी वशिष्ठजी आठ ऋषि-मुनियों के साथ दरबार में पधारे। उनमें नारद जी भी थे। श्री राम ने जब यह समस्या उनके सम्मुख रखी तो नारद जी बोले, "राजन्! जिस कारण से इस बालक की अकाल मृत्यु हुई वह मैं आपको बताता हूँ। सतयुग में केवल ब्राह्मण ही तपस्या किया करते थे। फिर त्रेता के प्रारम्भ में क्षत्रियों को भी तपस्या का अधिकार मिल गया। अन्य वर्णों का तपस्या में रत होना अधर्म है। हे राजन्! निश्चय ही आपके राज्य में कोई शूद्र वर्ण का मनुष्य तपस्या कर रहा है, उसी से इस बालक की मृत्यु हुई है। इसलिये आप खोज कराइये कि आपके राज्य में कोई व्यक्ति कर्तव्यों की सीमा का उल्लंघन तो नहीं कर रहा। इस बीच ब्राह्मण के इस बालक को सुरक्षित रखने की व्यवस्था कराइये।"
नारदजी की बात सुनकर उन्होंने ऐसा ही किया। एक ओर सेवकों को इस बात का पता लगाने के लिये भेजा कि कोई अवांछित व्यक्ति ऐसा कार्य तो नहीं कर रहा जो उसे नहीं करना चाहिये। दूसरी ओर विप्र पुत्र के शरीर की सुरक्षा का प्रबन्ध कराया। वे स्वयं भी पुष्पक विमान में बैठकर ऐसे व्यक्ति की खोज में निकल पड़े। पुष्पक उन्हें दक्षिण दिशा में स्थित शैवाल पर्वत पर बने एक सरोवर पर ले गया जहाँ एक तपस्वी नीचे की ओर मुख करके उल्टा लटका हुआ भयंकर तपस्या कर रहा था। उसकी यह विकट तपस्या देख कर उन्होंने पूछा, "हे तपस्वी! तुम कौन हो? किस वर्ण के हो और यह भयंकर तपस्या क्यों कर रहे हो?"
यह सुनकर वह तपस्वी बोले, "महात्मन्! मैं शूद्र योनि से उत्पन्न हूँ और सशरीर स्वर्ग जाने के लिये यह उग्र तपस्या कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बूक है।"
शम्बूक की बात सुनकर रामचन्द्र ने म्यान से तलवार निकालकर उसका सिर काट डाला। जब इन्द्र आदि देवताओं ने महाँ आकर उनकी प्रशंसा की तो श्रीराम बोले, "यदि आप मेरे कार्य को उचित समझते हैं तो उस ब्राह्मण के मृतक पुत्र को जीवित कर दीजिये।" राम के अनुरोध को स्वीकार कर इन्द्र ने विप्र पुत्र को तत्काल जीवित कर दिया।
Saturday, June 26, 2010
भोग सम्भोग एक अवतारी पुरुष का

कृष्ण भारत के आदर्श हैं . प्रेम करना तो कोई उनसे सीखे . अगर उनका मार्ग अपनाया जाये तो समाज से दहेज़ प्रथा की अर्थी उठ जाएगी . उनकी रास लीला और सम्भोग का वर्णन सवर्ण लेखक कैसे करता है , देखो .
http://books.google.co.in/books?id=35o5rtuYOYUC&pg=PA543&lpg=PA543&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%97+%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3&source=bl&ots=5EQHCDsDUr&sig=-c2I9ZzG425xH68cPpalLoAr3jg&hl=en&ei=zwEmTIO4HoGUrAfx3qyFBQ&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=10&ved=0CDYQ6AEwCQ#v=onepage&q=%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A5%8B%E0%A4%97%20%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3&f=false
Friday, June 25, 2010
मेरे राम …तुम सार्वकालिक अभागे हो।
मेरे राम …
Filed under: राम — गिरिजेश राव
मेरे राम
तुम कसौटी नायक हो।
तुम सार्वकालिक अभागे हो।
000
मेरे सामने जाने कितने बाली हैं
आधी क्या पूरी ताकत हर लेते हैं।
उनसे लड़ना है लेकिन छिपना नहीं है
मैं तुम्हारे समान कायर नहीं।
मेरी कसौटी है
भले न लड़ूँ लेकिन
उनके लिए वृक्ष अवश्य बनूँ
ताकि मेरी आड़ ले
वे मार सकें तुम्हारे जैसे मानवाधिकारों के हनक को।
मैं इस तरह से खुले में खड़ा लड़ता रहता हूँ
देखो कितने घाव खाए हैं-
मैं तुम्हारी तरह कायर नहीं।
000
सीता की अग्नि परीक्षा तो जाने हुई या नहीं
पर अभी भी तुम उसकी कसौटी पर कसे जाते हो
मानो मेरी बात
जाने कितने उदारवादी और (चाहे जो) वादी हो गए
प्रगतिशील हो गए
तुम्हें अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कस कर।
मैं तुम्हें कसता हूँ
खग मृग तरु से सीता का हाल पूछ्ते तुम्हारे आसुओं पर।
सोचता हूँ कित्ता मूरख हूँ।
000
वे अभागे ऋषि महर्षि
अस्थि क्षेत्रों में तप करते
उनका मांस तक कोमल हो जाता था।
सुस्वादु राक्षस भोज।
राम तुम क्यों गए
उन सुविधाभोगियों के लिए लड़ने?
देखो इस वातानुकूलित लाइब्रेरी में
फोर्ड फाउंडेसन की स्कॉलरशिप जेब में डाले
कितने लोग विमर्श कर रहे हैं
इनकी कसौटी पर तुम हमेशा अपने को नकली पाओगे
राम! तुम कितने अभागे हो।
000
जाने किन शक हूणों के चारण कवियों ने
तुमसे शम्बूक वध करा डाला
उसकी कसौटी से तुम्हें दलित साहित्य परख जाता है
तुम उस कसौटी पर हो एक राजमद मत्त सम्राट
घनघोर वर्णवादी।
मैं अपनी कसौटी हाथ लिए भकुवाया रहता हूँ
कि तुम कसने से कुछ बच खुच गए हो
तो कसूँ तुम्हें
निषादराज के आलिंगन में
चखूँ तुम्हें शबरी के जूठे बेरों में।
कसूँ तुम्हें वानर भालुओं के
उछाह भरे शौर्य पर
(दलित शोषित लिखूँ क्या?
लेकिन वे तो इंसान हैं।
बात चीत करते
परिवारी वानर भालुओं की तरह
राक्षसों के आहार नहीं हैं वे)
वह आत्मविश्वास कैसे भर गए थे उनमें
खड़े हो गए वे नरमांस के आदियों के सामने
आहार नहीं समाहार बन, उनका संहार बन।
क्या वह केवल अपनी बीबी को वापस लाने को था
ताकि तुम्हारा पौरुष फिर से गौरव पा सके ?
मेरी कसौटी कुछ अधिक बर्बर है
लेकिन क्या करूँ?
तुम्हें ऐसे न कसूँ तो प्रगतिशील कैसे कहाऊँ!
000
विभीषण को राक्षस राज्य सौंप
सुग्रीव को वानर राज्य सौंप
निषादराज को जंगल, नदी, वन का दायित्त्व सौंप
तुम दरिद्र!
ऐश्वर्य पा इतने बौरा गए!
हजारो अश्वमेध यज्ञ कर गए?
राम !
बड़ा विरोधाभासी चरित्र है तुम्हारा!!
चरित्र की कसौटी पर तुम ‘फेल’ हो।
000
लांछ्न पर सीता को हकाल दिए
कैसी पीड़ा थी राम!
तुम्हारी रातें कैसी थीं राम
भोग विलास आनन्द कैसे थे राम!
सीता त्याग के बाद?
मुआफ करना मुझे यह सब पूछ्ना है
क्यों कि किसी सिरफिरे ने कहा है
तुमने ग्यारह हजार साल राज किया
सीता त्याग वाली बात उसी ने बताई थी
सच ही कहा होगा।
तुम नारी विरोधी !
मेरी कसौटी झूठ की कसौटी भले सही
तुम्हें कसना तो होगा ही।
(कोई मुझे बकवासी कह रहा है।)
000
तुम पाखंडी!
इतने निस्पृह अनासक्त थे तो
सीता भू-प्रवेश के बाद
लक्ष्मण को क्यों त्याग दिए?
स्वयं आत्महत्या कर गए
सरयू में छलांग लगा
कैसी कसौटी थी वह राम ?
मुझे हैरानी होती है
कोई तुम्हारी आत्महत्या की बात क्यों नहीं करता?
000
मेरे राम
कसौटियाँ सेलेक्टिव हैं
तुम हमेशा इन पर कसे जाओगे।
तुम्हारे जन्मस्थान के कसौटी स्तम्भ नकली थे
ढहा दिए गए।
इस ठिठुरती सर्दी में
सम्राट राम !
किसी गरीब रिक्शेवाले के साथ
तुम भी खुले में सो जाओगे।
मेरी इस कविता पर कुछ लोग हँसेंगे
कहेंगे इसे इसलिए दु:ख है कि
सम्राट और रिक्शेवाला एक साथ क्यों हैं?
मेरी कसौटी का संहार
मेरी बकवास और कंफ्यूजन का अंत
हर सुबह होता है राम
जब मैं सुनता हूँ
जम्हाई लेते रिक्शेवाले के मुँह से
पहली आवाज़
हे राम
मेरे राम . . .
http://girijeshrao.wordpress.com/category/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae/
गिरिजेश राव से साभार
Filed under: राम — गिरिजेश राव
मेरे राम
तुम कसौटी नायक हो।
तुम सार्वकालिक अभागे हो।
000
मेरे सामने जाने कितने बाली हैं
आधी क्या पूरी ताकत हर लेते हैं।
उनसे लड़ना है लेकिन छिपना नहीं है
मैं तुम्हारे समान कायर नहीं।
मेरी कसौटी है
भले न लड़ूँ लेकिन
उनके लिए वृक्ष अवश्य बनूँ
ताकि मेरी आड़ ले
वे मार सकें तुम्हारे जैसे मानवाधिकारों के हनक को।
मैं इस तरह से खुले में खड़ा लड़ता रहता हूँ
देखो कितने घाव खाए हैं-
मैं तुम्हारी तरह कायर नहीं।
000
सीता की अग्नि परीक्षा तो जाने हुई या नहीं
पर अभी भी तुम उसकी कसौटी पर कसे जाते हो
मानो मेरी बात
जाने कितने उदारवादी और (चाहे जो) वादी हो गए
प्रगतिशील हो गए
तुम्हें अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कस कर।
मैं तुम्हें कसता हूँ
खग मृग तरु से सीता का हाल पूछ्ते तुम्हारे आसुओं पर।
सोचता हूँ कित्ता मूरख हूँ।
000
वे अभागे ऋषि महर्षि
अस्थि क्षेत्रों में तप करते
उनका मांस तक कोमल हो जाता था।
सुस्वादु राक्षस भोज।
राम तुम क्यों गए
उन सुविधाभोगियों के लिए लड़ने?
देखो इस वातानुकूलित लाइब्रेरी में
फोर्ड फाउंडेसन की स्कॉलरशिप जेब में डाले
कितने लोग विमर्श कर रहे हैं
इनकी कसौटी पर तुम हमेशा अपने को नकली पाओगे
राम! तुम कितने अभागे हो।
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जाने किन शक हूणों के चारण कवियों ने
तुमसे शम्बूक वध करा डाला
उसकी कसौटी से तुम्हें दलित साहित्य परख जाता है
तुम उस कसौटी पर हो एक राजमद मत्त सम्राट
घनघोर वर्णवादी।
मैं अपनी कसौटी हाथ लिए भकुवाया रहता हूँ
कि तुम कसने से कुछ बच खुच गए हो
तो कसूँ तुम्हें
निषादराज के आलिंगन में
चखूँ तुम्हें शबरी के जूठे बेरों में।
कसूँ तुम्हें वानर भालुओं के
उछाह भरे शौर्य पर
(दलित शोषित लिखूँ क्या?
लेकिन वे तो इंसान हैं।
बात चीत करते
परिवारी वानर भालुओं की तरह
राक्षसों के आहार नहीं हैं वे)
वह आत्मविश्वास कैसे भर गए थे उनमें
खड़े हो गए वे नरमांस के आदियों के सामने
आहार नहीं समाहार बन, उनका संहार बन।
क्या वह केवल अपनी बीबी को वापस लाने को था
ताकि तुम्हारा पौरुष फिर से गौरव पा सके ?
मेरी कसौटी कुछ अधिक बर्बर है
लेकिन क्या करूँ?
तुम्हें ऐसे न कसूँ तो प्रगतिशील कैसे कहाऊँ!
000
विभीषण को राक्षस राज्य सौंप
सुग्रीव को वानर राज्य सौंप
निषादराज को जंगल, नदी, वन का दायित्त्व सौंप
तुम दरिद्र!
ऐश्वर्य पा इतने बौरा गए!
हजारो अश्वमेध यज्ञ कर गए?
राम !
बड़ा विरोधाभासी चरित्र है तुम्हारा!!
चरित्र की कसौटी पर तुम ‘फेल’ हो।
000
लांछ्न पर सीता को हकाल दिए
कैसी पीड़ा थी राम!
तुम्हारी रातें कैसी थीं राम
भोग विलास आनन्द कैसे थे राम!
सीता त्याग के बाद?
मुआफ करना मुझे यह सब पूछ्ना है
क्यों कि किसी सिरफिरे ने कहा है
तुमने ग्यारह हजार साल राज किया
सीता त्याग वाली बात उसी ने बताई थी
सच ही कहा होगा।
तुम नारी विरोधी !
मेरी कसौटी झूठ की कसौटी भले सही
तुम्हें कसना तो होगा ही।
(कोई मुझे बकवासी कह रहा है।)
000
तुम पाखंडी!
इतने निस्पृह अनासक्त थे तो
सीता भू-प्रवेश के बाद
लक्ष्मण को क्यों त्याग दिए?
स्वयं आत्महत्या कर गए
सरयू में छलांग लगा
कैसी कसौटी थी वह राम ?
मुझे हैरानी होती है
कोई तुम्हारी आत्महत्या की बात क्यों नहीं करता?
000
मेरे राम
कसौटियाँ सेलेक्टिव हैं
तुम हमेशा इन पर कसे जाओगे।
तुम्हारे जन्मस्थान के कसौटी स्तम्भ नकली थे
ढहा दिए गए।
इस ठिठुरती सर्दी में
सम्राट राम !
किसी गरीब रिक्शेवाले के साथ
तुम भी खुले में सो जाओगे।
मेरी इस कविता पर कुछ लोग हँसेंगे
कहेंगे इसे इसलिए दु:ख है कि
सम्राट और रिक्शेवाला एक साथ क्यों हैं?
मेरी कसौटी का संहार
मेरी बकवास और कंफ्यूजन का अंत
हर सुबह होता है राम
जब मैं सुनता हूँ
जम्हाई लेते रिक्शेवाले के मुँह से
पहली आवाज़
हे राम
मेरे राम . . .
http://girijeshrao.wordpress.com/category/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae/
गिरिजेश राव से साभार
Thursday, June 24, 2010
गीता : एक ‘शरारतपूर्ण पुस्तक‘
भारत का शायद ही कोई ऐसा बुद्धिजीवी होगा जिसने डा. भीमराव अम्बेडकर की भांति गीता को एक ‘शरारतपूर्ण पुस्तक‘ कहा हो। सभी हिन्दू नेतागण-क्या समाज सुधारक और क्या राजनीतिज्ञ-गीता की प्रशंसा के पुल ही बांधते चले गये। विचारणीय बात तो यह है कि गीता के उपदेशों का अनुसरण करते हुये समाज कैसा निर्मित हुआ ? इस प्रश्न का उत्तर श्री विवेकानंद के यह शब्द देते हैं-‘‘एक देश जहां लाखों लोगों के पास खाने को कुछ नहीं है और जहां कुछ हजार पुण्य-व्यक्ति तथा ब्राह्मण गरीबों का खून चूसते है और उनके लिए कुछ भी नहीं करते। हिन्दोस्तान एक देश नहीं है जिन्दा नरक है। यह धर्म है या मौत का नाच।‘‘ -फ्ऱंट लाईन, दिनांक सितम्बर 18, 1993, पृष्ठ 11
यह अंश एल. आर. बाली,संपादक-भीम पत्रिका, की पुस्तक ‘हिन्दूइज़्म : धर्म या कलंक‘ से साभार उद्धृत है। मिलने का पता : ईएस-393 ए, आबादपुरा, जालंधर 144003
यह अंश एल. आर. बाली,संपादक-भीम पत्रिका, की पुस्तक ‘हिन्दूइज़्म : धर्म या कलंक‘ से साभार उद्धृत है। मिलने का पता : ईएस-393 ए, आबादपुरा, जालंधर 144003
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